भारत की झीले - Bharat ki jheel pdf download

भारत की प्रमुख झीलें(Bharat ki jheel):-

इस लेख में आपको Bharat ki jheel के बारे में जानकारी मिलेगी। इसमें Bharat ki jheel के बारे में विस्तार से बताया गया है।
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झीलें मानव के लिए अत्यधिक लाभदायक होती हैं। एक झील नदी के बहाव को सुचारु बनाने में सहायक होती है।

अत्यधिक वर्षा के समय यह बाढ़ को रोकती है तथा सूखे के मौसम में यह पानी के बहाव को संतुलित करने में सहायता करती है।

झीलों का प्रयोग जलविद्युत उत्पन्न करने में भी किया जा सकता है। ये आस-पास के क्षेत्रों की जलवायु को सामान्य बनाती हैं, जलीय पारितंत्र को संतुलित रखती हैं, झीलों की प्राकृतिक सुंदरता व पर्यटन को बढ़ाती हैं।

भारत की झीलों के प्रकार:-

विवर्तनिक झीलें (Tectonic Lakes) :

इन झीलों का निर्माण पृथ्वी के भूपटल में हुए दरार तथा भ्रंश के कारण होता हैं। कश्मीर तथा कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाने वाली ज्यादातर झीलें इस प्रकार की होती हैं। त्सो मोरिरि एवं पांगोंडा (लद्दाख) ऐसी झीलों के उदाहरण हैं।

कश्मीर की वूलर झील भूगर्भीय क्रियाओं से बनी है। यह भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी वाली प्राकृतिक झील है।

क्रेटर/ज्वालामुखी झीलें (Creater Lakes) :


क्रेटर झीलों का निर्माण तब होता है जब ज्वालामुखीय विवर तथा ज्वालामुख कुण्ड जल से भर जाते हैं। वे भारत में अल्प संख्या में पाए जाते हैं। बुलधाना (महाराष्ट्र) का लोनार झील क्रेटर झील का उदाहरण है।

लैगून (Lagoons) :


इनका निर्माण समुद्र-तट के किनारे बालू-भित्ति के निक्षेपन के कारण होता है।
चिल्का झील (उड़ीसा) भारत की सबसे बड़ी लैगून झील है।

इसके अलावा अन्य लैगून (खारे पानी की) झील हैं पुलीकट झील (आंध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु),अष्ठमुडी झील (केरल), कोलेरू झील (आंध्र प्रदेश)। सांभर झील भारत की खारे पानी की सबसे बड़ी अन्तः स्थलीय झील है।

हिमानी द्वारा बनी झीलें (Glacial Lakes) :


हिमानी द्वारा बनाए गए गड्ढों के किनारों पर जब अवसाद के जमा हो जाने से बड़े-बड़े गढ्ढे बन जाते हैं तब यही गढ्ढे कालान्तर में हिम के पिघले हुए जल के भर जाने पर झीलें बन जाती है।

इस प्रकार की झीलें अधिकतर कुमायूं हिमालय में पायी जाती हैं। इनके मुख्य उदाहरण राकसताल, नैनीताल, नौकुछिया ताल, भीमताल आदि हैं।

कभी-कभी हिमोढ़ या मोरेन के ढेर भी मार्ग को अवरुद्ध कर देते हैं जिससे वहां झीले बन जाती हैं। ऐसी झीलें मोरेन झीलें (Moraine Lakes) कहलाती हैं। पीरपंजाल श्रेणी के उत्तरी-पूर्वी ढालों पर इस प्रकार की कई झीलें बनी हैं।

वायु द्वारा निर्मित झीलें (Aerolion or Playa Lakes) :


इस प्रकार की झीलें मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान के थार के मरुस्थल में पायी जाती हैं, इन्हें “ढांढ़' भी कहते हैं।

यह झीलें अस्थायी होती हैं। इस भाग में बालू मिट्टी के टीले अधिक पाए जाते हैं। इन टीलों के बीच में नीची भूमि भी मिलती है। वर्षा के दिनों में इस भूमि में जल भर जाता है और झीलें बन जाती हैं।

सांभर,डीडवाना, पंचभद्रा ऐसी ही झीलें हैं। इन्हें राजस्थान में सर (तलाई) के नाम से भी पुकारते हैं।

भूस्खलन की झीलें (Landsleded Lakes) :


पर्वतीय ढालों पर अपक्षय के प्रभाव से ढीले पदार्थ एकत्रित होते रहते हैं।

कभी-कभी यह जमाव यकायक नीचे खिसक जाता है। इससे नदी घाटी में जलधारा का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है और अस्थाई
जलाशय बन जाता है।

(1893) में अलकनन्दा नदी के मार्ग में एक पहाड़ी ढाल से शैलों के खिसक पड़ने से गोहना नामक झील बन गयी थी। अतः नदी मार्ग पुनः खुलते ही इनमें भयंकर बाढ़ें जा आती हैं। इन्हें 'राफ्ट झीलें' भी कहते हैं।

नदियों के मार्ग में झीलों की रचना (Meandering Lakes) :

कई स्थानों पर रुकावट पड़ने से जल के जमा हो जाने से ऐसी झीलें बनती हैं अथवा मैदानी प्रदेशों में नदी जब धीमे-धीमे बहती है तो वहां छाड़न या गोखुराकार झीलें बनती हैं।
बाढ़ के समय उनमें पुनः जल भर जाता है,

ब्रह्मपुत्र एवं गंगा की मध्य घाटी में इस प्रकार की झीलें पायी जाती हैं।

अष्टामुदी झील (अष्टामुदी कयाल) :


यह केरल के कोलम जिले में एक लैगून है। अष्टामुदी का अर्थ "आठ शाखाएं" हैं।
वास्तव में इस झील की अनेक शाखाएं हैं। रामसर समझौते के तहत यह अंतर्राष्ट्रीय महत्व की एक आर्द्रभूमि के रूप में दर्ज है।

भीमताल :


उत्तराखण्ड के कुमाऊं मण्डल में भीमताल शहर के निकट स्थित यह एक रमणीय झील है, जिसके केन्द्र में एक द्वीप है।

नैनीताल की अधिक प्रसिद्धी के कारण प्राचीन भीमताल शहर का महत्व कम रहा है। वर्तमान में यह शहर अनेक राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है।

चंद्रा ताल :


यह हिमाचल प्रदेश के लाहौल तथा स्पिती जिले में एक अधिक ऊंचाई वाली झील है।
यह समुद्री सतह से लगभग 4300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। लाहूल तथा स्पीति को जोड़ने वाला कुंजम दर्रा इस झील से लगभग 6 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।

चेम्बरमबक्कम झील :


यह तमिलनाडु के चेंगपटू जिले में चेन्नई से 40 कि.मी. दक्षिण में स्थित है। इस झील से ही अदयार नदी का उद्गम होता है। चेन्नई महानगर की जलापूर्ति इस झील से होती है।

चिल्का झील :


उड़ीसा राज्य में स्थित यह एक खारे पानी की तटीय झील है। भारत में यह सबसे बड़ा तटीय झील है।

यह झील महानदी द्वारा गाद-भरने की क्रिया से निर्मित हुयी है। इस झील का क्षेत्र परिवर्तनशील है, यह मानसून के मौसम में 1175 वर्ग कि.मी. होता है तथा शुष्क मौसम में 900 वर्ग कि.मी. होता है।

डल झील :


डल झील श्रीनगर की एक प्रसिद्ध झील है। 18 वर्ग कि.मी. के क्षेत्रफल में फैली हुयी यह झील सेतुकों (Canseways) द्वारा चार बेसिनों में विभाजित है - गगरीबल, लोकुत डल, बोद डल तथा नागिन।

यह लगभग 500 शिकारे (House)के लिए प्रसिद्ध है। शिकारे के अलावा, यह झील डोंगी खेना (Canoeing), 'वाटर-सर्किंग' तथा 'किथाकिंग' की भी सुविधा पर्यटकों को प्रदान करते है।

इसके किनारे पर कई गांव एवं उपवन बने हैं, जिनमें अनेक फलों के बाग हैं। यहां के शालीमार और निशात बाग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

ढेबर झील (जयसमंद) :


राजस्थान राज्य में उदयपुर से लगभग 45 कि.मी. पूर्व में स्थित यह झील भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील है।

यह 87 वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैली हुई है। यह 17वीं सदी में उदयपुर के राणा जयसिंह द्वारा बनायी गयी, जब उन्होंने

गोमती नदी पर एक संगमरमर का बांध बनवाया था। इस झील में तीन द्वीप हैं, जैसमंद सैरगाह (Resort) इनमें से सबसे बड़े द्वीप पर स्थित है।

हिमायत सागर :


यह हैदराबाद शहर से लगभग 20 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। इस झील का नाम निजाम (VII) के सबसे छोटे बेटे हिमायत अली खान के नाम पर रखा गया है। यह एक कृत्रिम झील है, जो मूसी नदी पर 1927 में बनाया गया था।

हुसैन सागर :


यह हैदराबाद शहर में स्थित है। यह हुसैन शाह वली द्वारा 1562 में मूसी नदी के एक सहायक नदी पर बनाया गया। यह हैदराबाद शहर की जलापूर्ति करती है।

कालीवेली झील :


यह एक तटीय झील है, जो तमिलनाडु के विलुप्पुरम जिले में स्थित है। यह पुडुचेरी से लगभग 10 कि.मी. उत्तर की ओर स्थित है। यह झील प्रायद्वीपीय भारत के बड़े आर्द्रभूमि में से एक है। यह कृषीय भूमि द्वारा अधिकृत किया जा रहा है। इस झील का क्षेत्रफल घटना जा रहा है।

खज्जीयार झील :


यह हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में स्थित है, यह डलहौजी से मात्र 24 कि.मी. दूर है। देवदार वृक्षों से घिरे होने के कारण यह पर्यटकों के लिए एक रमणीय दृश्य प्रदर्शित करती है।

खेचियोपालरी झील :


यह पश्चिमी सिक्किम में स्थित है। यह हिन्दुओं तथा बौद्ध धर्मियों द्वारा एक पवित्र झील मानी जाती है। यह झील बाँस के घने वनों से घिरी है। इस झील को देखने अनेक तीर्थयात्री तथा पर्यटक आते हैं।

कोलेरू झील :


आंध्र प्रदेश में स्थित यह झील मीठे पानी की झील है। यह झील लगभग 20 मिलियन आवासीय तथा प्रवासी पक्षियों का प्राकृतिक वास है।

प्रतिवर्ष अक्टूबर-मार्च के मध्य यहां साइबेरिया तथा पूर्वी यूरोप से आए पक्षियों का वास होता है। इस झील को भारतीय वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत 1999 में एक वन्य जीव विहार (Sancturary)/शरण-क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया गया।

लोकटक झील (मणिपुर) :


यह मीठे पानी की पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी झील है। इसे मणिपुर की जीवन रेखा कहते हैं।

इस झील में कबुललामजाओं नाम का तैराता हुआ राष्ट्रीय पार्क है।
क्योंकि इसमें तैरते हुए फुम्डिज (तैरते हुए द्वीप) होते हैं। रामसर
कन्वेशन के तहत यह 1990 में अन्तर्राष्ट्रीय महत्व की एक आर्द्रभूमि मानी गयी। फुम्डिज वास्तव में वनस्पति, मृदा तथा जैव-पदार्थों के विजातीय ढेर है।

नाको झील :


हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में स्थित यह एक अधिक ऊँचाई वाली झील है। यह झील भिसा (Willow) तथा पहाड़ी पीपल (Poplar) वृक्षों से घिरी हुयी है। इस झील के निकट बौद्ध धर्म के चार मंदिर हैं। यह एक पवित्र झील मानी जाती है।

ओसमान सागर :


यह हैदराबाद में एक कृत्रिम झील है। हैदराबाद के अंतिम निजाम (ओसमान अली खान) के द्वारा 1920 में मूसी नदी पर बाँध बनाकर इस झील को निर्मित किया गया।

यह हैदराबाद शहर के लिए पीने के पानी का स्रोत है। 'सागर महल' नाम का एक गेस्ट हाउस जो इस झील का ऊपरी नजारा लेता है।

पोनगोंग सो :


लद्दाख में स्थित यह झील लेह शहर से लगभग पांच घंटे की दूरी पर है। यह मार्ग विश्व के तीसरे सबसे बड़े दर्रे (चांगला दर्रा) से होकर गुजरता है।

झील को देखने के लिए एक विशेष अनुमति-पत्र की जरूरत होती है। सुरक्षा कारणों से यहां नौका-विहार की इजाजत नहीं दी जाती है। यहां एक छोटा होटल तथा पड़ाव-स्थान भी है और निकटवर्ती गाँवों के घरों में अतिथि कक्ष भी मौजूद है।

पुष्कर झील :


अजमेर जिले में स्थित यह एक कृत्रिम झील है। इस झील का निर्माण 12वीं सदी में हुआ जब लूनी नदी के नदीशीर्ष पर एक बाँध बनाया गया।
नवम्बर के महीने में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर अनेक तीर्थयात्री इस झील में पवित्र स्थान के लिए आते हैं।

रेणुका झील :


हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित इस झील का नाम देवी रेणुका के नाम पर है। इस जगह एक चिड़ियाघर तथा "लायन सफारी (कारवाँ) भी है। नवम्बर के महीने में यहां वार्षिक मेला लगता है।

सांभर झील :


यह जयपुर शहर से लगभग 70 कि.मी. दूर पश्चिम की ओर स्थित है तथा भारत की सबसे बड़ी खारे पानी का झील है। पूर्वी किनारे की ओर यह झील 5 कि.मी. लम्बे बाँध से विभाजित है जो पत्थरों से बनी हुयी है।

सांभर झील को रामसर सूची में अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि
के रूप में शामिल किया गया है। हजारों साइबेरियाई पक्षी जाड़े के मौसम में इस झील में आते हैं।

सास्थम कोट्टा झील :


यह केरल राज्य में मीठे पानी की एक बड़ी झील है। यह झील कोल्लम जिले में सास्थमकोटा में स्थित है तथा यह कोल्लम शहर से लगभग 30 कि.मी. दूर है। यह पर्यटकों के लिए एक बड़े आकर्षण का केन्द्र है।

सतताल अथवा सत्ता :


यह उत्तराखण्ड के कुमाऊं प्रखण्ड में भीमताल शहर के नजदीक सात शांत झीलों का समूह है। ये झीलें औसत् समुद्री सतह से लगभग 1370 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। ये झीलें प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग है।

सूरज ताल :


बारालच्छा दर्रे के शिखर के नीचे स्थित यह एक अधिक ऊँचाई वाली झील है। यह समुद्री सतह से लगभग 4980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह झील भागा नदी का स्रोत है, जो चेनाब की एक मुख्य सहायक नदी है।

तवावोइर जलाशय : 


होशंगाबाद जिले (म.प्र.) में नर्मदा नदी पर स्थित इस जलाशय का निर्माण तवा बांध के कारण हुआ। यह
झील सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान तथा बोरी वन्य जीवन अभ्यारण की पश्चिमी सीमा का निर्माण करती है।

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