राजस्थान की लोक देवियाँ | Rajasthan Ki Lok Deviyan

नमस्कार दोस्तों आपका एक बार फिर स्वागत है इस नई पोस्ट में। इस पोस्ट में आप राजस्थान की Lok Deviyan के बारे में विस्तार से पढोगे। इस लेख में आपको राजस्थान की सभी lok deviyan के बारे में जानकारी मिलेगी। Rajasthan ke lok devi
Rajasthan ki lok deviyan


किणसरिया की कैवायमाता, (नागौर) :


नागौर जिले के मकराना और परबतसर के बीच त्रिकोण पर परबतसर से 6-7 का.मी. उत्तर-पश्चिम में अरावली पर्वतमाला से परिवेष्टित किणसरिया गाँव है। जहां एक विशाल पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊँची चोटी पर कैवायमाता का बहुत प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर अवस्थित है।


नैणसी के अनुसार किणसरिया का पुराना नाम सिणहाड़िया था।


कैवायमाता का यह मंदिर लगभग 1000 फीट ऊँची विशाल पहाडी पर स्थित है। कैवायमाता के मंदिर के सभामण्डप की बाहरी दीवार पर विक्रम संवत 1056 (999 ई.) का एक शिलालेख उत्कीर्ण है। उक्त शिलालेख से पता चलता है कि दधीचिक वंश के शासक चच्चदेव ने जो कि साँभर के चौहान राजा दुर्लभराज (सिंहराज का पुत्र) का सामन्त था।


विक्रम संवत 1056 की वैशाख सुदि 3, अक्षय तृतीया रविवार अर्थात् 21 अप्रैल, 999 ई. के दिन भवानी (अम्बिका) का यह भव्य मंदिर बनवाया।

शीतला माता, जोधपुर एवं जयपुर :


मनुष्यों के शरीर की गर्मी को शीतलता प्रदान करने वाली देवी को शीतला माता कहा जाता है।


इसे उत्तर भारत में मातामाई या महामाई, पश्चिमी भारत में माई अनामा तथा राजस्थान में सैढ़ल माता या शीतला के नाम से जाना जाता है।

इस देवी का मुख्य मंदिर जोधपुर नगर में कागा क्षेत्र में स्थित है। यह एकमात्र देवी है जो खण्डित रूप में पूजी जाती है। बाद में इस प्रतिमा को कागा में स्थापित किया गया।


जयपुर के नरेश सवाई माधोसिंह ने भी चाकसू की शील डूंगरी पर शीतला देवी का मंदिर बनवाया, जो सर्वत्र प्रसिद्ध है। शीतला माता की पूजा लगभग सम्पूर्ण राजस्थान में होती है।


इसकी चेचक निरोधी देवी के रूप में पूजा की जाती है। इस देवी का वाहन गधा एवं पुजारी कुम्हार होता है। चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतलाष्टमी) के दिन लोग बास्योड़ा मनाते हैं अर्थात् रात का बनाया ठण्डा भोजन खाते हैं। प्राय: जांटी (खेजड़ी)को शीतला मानकर पूजा की जाती है। यह बच्चों की संरक्षिका देवी है।

जमवाय माता :


जमवाय माता का प्रसिद्ध शक्तिपीठ जयपुर से लगभग 33 किलोमीटर पूर्व दिशा में जमवा रामगढ़ बांध के
निकट अरावली की सुरम्य पर्वतमाला के बीच एक पहाड़ी नाके पर स्थित है।


जमवाय माता का पौराणिक नाम जामवंती है।

आई माता, बिलाड़ा (जोधपुर) :


बीका डाभी की आई नाम की सुंदर कन्या भक्त रैदास की शिष्या हो गयी। मांडू का बादशाह इन्हें बहुत चाहता था तथा उन्हें अपनी बेगम बनाना चाहता था। इस कारण आई मालवा छोड़कर अपने पिता के साथ मारवाड़ आ गयी। तपस्या के बल पर आई बिलाड़ा में ज्योतिस्वरूप विलीन हो गयी। बिलाड़ा में आई माता का मंदिर है।


आई माता सीरवी जाति के लोगों की कुल देवी है। आई जी रामदेव की शिष्या थी, ये नवदुर्गा (मानी देवी) की अवतार मानी जाती हैं।

भक्त इनके मन्दिर को 'दरगाह' कहते हैं। बिलाड़ा में इनका थान है जिसे 'बडेर' कहते हैं। यहाँ अखण्ड ज्योति प्रज्ज्वलित रहती है जिससे केसर टपकती रहती है।

आवड़ माता/हिंगलाज माता, जैसलमेर :


चारणों द्वारा पूज्य इस देवी को “हिंगलाज माता' का
अवतार माना जाता है। कहा जाता है कि ये सात बहनें थी और सातों ही देवी बन गयी।


इनके पिता मामड़ साड़वा शाखा के चारण थे। जैसलमेर जिले में तेमड़ा भाखर पर आवड़ माता का स्थान बना हुआ है जिसके कारण आवाड़माता को तेमड़ाताई भी कहते हैं।

ये जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुल देवी हैं।

चारण देवियों के स्तुति पाठ 'चरजा' कहलाता है। चरजा दो प्रकार से किया जाता है- सिगाऊ और घाड़ाऊ। सिगाऊ शांति के समय देवी की प्रशंसा में पढ़ा जाता है। और घाड़ाऊ विपत्ति के समय पढ़ा जाता है।

मोदरां माता/आशापुरी माता, जालौर :


आशापुरी देवी कच्छ भुज से लूण भाणजी बिस्सा के साथ 1143 ई. के आस-पास पोकरण आई थी। जहाँ इनका मन्दिर बना हुआ है। आशा पूर्ण करने वाली देवी को आशापुरी देवी कहते हैं।


चौहान शासकों की कुलदेवी आशापुरी देवी थी जिसका मंदिर जालौर जिले में 'मोदरां माता' अर्थात् 'महोदरी' अर्थात् बड़े उदर वालीमाता के नाम से विख्यात है।

कैला देवी, करौली :


ये करौली के यदुवंश की कुलदेवी हैं। कैलादेवी को दुर्गा के रूप में यह राजवंश पूजता है। मान्यता है कि त्रिकुट पर्वत पर कैलादेवी बनकर प्रकट हुई। इनके भक्त इनकी आराधना में प्रसिद्ध "लागूरिया गीत' गाते हैं। कैलादेवी का लक्खी मेला प्रतिवर्ष चैत्र मास की शुक्ला अष्टमी को भरता है।

करणी माता, बीकानेर :


बीकानेर के राठौड़ शासकों की कुल देवी करणी जी 'चूहों वाली देवी' के नाम से भी विख्यात हैं। इनके आशीर्वाद से ही राव बीका ने बीकानेर राज्य की स्थापना की थी। इनका जन्म सुआप गाँव में चारण जाति के श्रीमहा जी के घर हुआ था।


'देशनोक' स्थित इनके मंदिर में बड़ी संख्या में चूहे हैं जो करणीजी के काबे' कहलाते हैं। यहाँ के सफेद चूहे दर्शन करणीजी के दर्शन माने जाते है। करणीजी का मंदिर मठ कहलाता है। करणी देवी का एक रूप 'सफेद चील' भी है।


करणीजी की इष्ट देवी ‘तेमड़ा' थी। करणीजी के मन्दिर के पास तेमडाराय देवी का मन्दिर भी है। करणीजी के मंदिर के पुजारी चारण जाति के होते हैं। भारत में ही नहीं अपितु विश्व में अकेले इस चूहों के मंदिर में चैत्र माह की नवरात्रि और आश्विन माह की नवरात्रि में दो बार मेला लगता है।

जीण माता, सीकर :


इनका असली और पूरा नाम जयन्तीमाला है। जीण माता का मंदिर सीकर से 15 किलोमीटर दक्षिण में रैवासा नामक गांव के पास तीन छोटी पहाड़ियों के मध्य स्थित है। यह चौहानों की कुल देवी है। इस मंदिर में जीणमाता की अष्टभुजी प्रतिमा है।


चुरू जिले के धांधू गाँव की चौहान राजकन्या ने अपनी भावज के व्यंग्य बाणों और प्रताड़ना से व्यथित होकर सांसारिक जीवन छोड़कर आजीवन अविवाहित रहकर इस स्थान पर कठोर तपस्या की। चौहान राजकन्या के भाई हर्ष ने अपनी रूठी हुई बहिन से घर वापस जाने के लिए बहुत अनुनय-विनय की, पर वह न मानी। तब हर्ष ने भी कठोर तपस्या करना शुरू कर दिया।


यहाँ चैत्र व आसोज के महीनों में शुक्ल पक्ष की नवमी को मेलें भरते हैं। राजस्थानी लोक साहित्य में इस देवी का गीत सबसे लम्बा है। इस गीत को कनफटे जोगी केसरिया कपड़े पहन कर, माथे पर सिंदूर लगाकर, डमरू एवं सारंगी पर गाते हैं।


माता के मंदिर का निर्माण पृथ्वीराज चौहान प्रथम के शासन काल में राजा हट्टड़ द्वारा करवाया गया।

राणी सती, झुंझुनूं :


अपने पति की चिता पर प्राणोत्सर्ग कर देने वाली सतियों की भी देवियों की तरह पूजा होती है। झुंझुनूं की राणी सती पूरे प्रदेश में पूजी जाती हैं। इनका नाम नारायणी बाई था तथा इनका विवाह तनधन दास से हुआ था।


झुंझुनूं में प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्णा अमावस्या को राणी सती का मेला भरता है। अब प्रदेश में सती पूजन एवं महिमा मण्डन पर रोक लगा दी गयी है। इन्हें दादीजी भी कहा जाता है। यह चण्डिका के रूप में पूजी जाती है। राणी सती के परिवार में 13 स्त्रियां सती हुई।

सकराय माता, सीकर :


इस देवी का स्थान शेखावटी में खंडेला के निकट उदयपुरवाटी के पास मलयकेतु पर्वत पर है। इसे सकराय माता एवं शाकंभरी भी कहते हैं। मंदिर में महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है।


अकाल पीड़ित लोगों को बचाने के लिए इसने फल, सब्जियां, कंदमूल उत्पन्न किये थे, इसी कारण यह देवी शाकंभरी कहलायी।

सकराय माता खण्डेलवालों की कुल देवी के रूप में विख्यात है। शाकंभरी का एक मन्दिर सांभर में तथा दूसरा सहारनपुर में है। इनका चैत्र व अश्विन माह में नवरात्रियों को मेला भरता है

सचिया माता, जोधपुर :


इसे सचिका तथा सच्चिका माता भी कहते हैं। इस देवी का मुख्य मंदिर जोधपुर जिले के ओसियां कस्बे में है। यह मंदिर आठवी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है।


सचिया माता के मन्दिर का निर्माण परमार राजकुमार उपलदेव ने करवाया था। इसमें काले प्रस्तर की महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है जो ओसवालों की कुलदेवी कही जाती है।

राठासण देवी, मेवाड़ :


मेवाड़ राज्य की राठासण देवी का मंदिर एकलिंगजी के मंदिर से कुछ ही दूरी पर बना हुआ है।
राष्ट्रश्येना देवी को अपभ्रंश में राठासण देवी कहा जाता है।

सुंधा माता, जालौर :


जालौर जिले के जसवंत गढ़ कस्बे के पास स्थित सुगंधाद्रि पर्वत पर सुंधा माता का मंदिर बना हुआ है।
यह एक प्राचीन तांत्रिक शक्ति पीठ है। यहाँ जालौर के चौहान शासकों का एक महत्त्वपूर्ण शिलालेख लगा हुआ है।

सुराणा देवी, नागौर :


सुराणा देवी ओसवालों की एवं दुग्गड शाखा की कुलदेवी मानी जाती है। इनका जन्म नागौर के रतिदास पुराणा के यहाँ हुआ। इनकी सगाई दुग्गड परिवार में हुई। पति के निधन के कारण ये गोरखाण गांव में जीवित ही धरती में समा गयी।

स्वांगियाजी/आईनाथजी माता, जैसलमेर :


जैसलमेर के राज्य चिह्न में स्वांग (भाला) को मुड़ा हुआ देवी के हाथ में दिखाया गया। आवड़ देवी का ही एक रूप स्वांगिया माता (आईनाथजी) भी है, जो जैसलमेर के निकट विराजमान है।

ये भी जैसलमेर के भाटी राजाओं की कुल देवी मानी जाती है। जैसलमेर के राज चिह्नों में सबसे ऊपर पालम चिड़िया (शगुन) देवी का प्रतीक है।


पथवारी माता : तीर्थयात्रा की सफलता की कामना हेतु राजस्थान में पथवारी देवी की लोक देवी के रूप में पूजा की जाती । पथवारी देवी गाँव के बाहर स्थापित की जाती है। इनके चित्रों में नीचे काला-गौरा भैंरू तथा ऊपर कावड़िया वीर व गंगोज कलश बनाया जाता है।

सुगाली माता, आउवा :


आउवा के ठाकुरों (चांपावतों) की कुलदेवी सुगाली माता का मंदिर (आउवा, पाली) सन् 1857 की क्रान्ति का मुख्य केन्द्र रहा। इसके 54 भुजाएं व 10 सिर हैं। बाद में अंग्रेजों ने सुगाली माता के भक्त कुशाल सिंह को गिरफ्तार कर माता के मंदिर को तहस-नहस किया।

ब्राह्मणी माता, बारा :


बारां जिले के सोरसन ग्राम के पास ब्राह्मणी माता का विशाल प्राचीन मंदिर स्थित है। विश्व में संभवतः यह अकेला मंदिर है जहाँ देवी की पीठ की ही पूजा होती है अग्र भाग की नहीं। यहाँ माघ शुक्ला सप्तमी को गधों का मेला भी लगता है।

बड़ली माता :


बड़ली माता का मंदिर चित्तौड़गढ़ जिले में छीपों के अंकोला में बेड़च नदी के किनारे स्थित है।


लटियाला माताजी-लुदवा : लटियाल माताजी कल्लों की कुलदेवी हैं। माताजी का मंदिर फलौदी में है। इस मंदिर के आगे खेजड़ा (शमीवृक्ष) स्थित है इसलिये भक्तगण इस लटियाल माताजी को खेजड़बेरी राय भवानी भी कहते है।


नारायणी माता : सरिस्का के जंगलों से घिरे भू-भाग में टहला से आने वाले मार्ग पर बरवां डूंगरी की तलहटी में नारायणी माता का मंदिर अलवर जिले की राजगढ़ तहसील में स्थित है। नाई जाति लोग नारायणी माता को सदा से अपनी कुलदेवी मानते आये हैं।


घेवर माता : घेवर माता का मंदिर सती मंदिर है जो राजसमन्द झील की पाल पर स्थित है। इस क्षेत्र में ऐसी लोकोक्ति है कि जब राजसमन्द की पाल बन रही थी तो एक पवित्र स्त्री की खोज की गई जिसके बांये गाल पर आंख के नीचे काला तिल हो।

अतः मालवा से घेवर बाई को लाया गया और उसी के हाथ से राजसमंद पाल का पहला पत्थर रखवाया गया। घेवर बाई उसी स्थानपर अपने पति के बिना ही सती हो गई।

आमजा, केलवाड़ा :


केलवाड़ा के पास गाँव रीछड़े में भीलों की देवी आमजा देवी का भव्य मंदिर है। मंदिर में पूजा के लिए एक भील भोपा तथा दूसरा ब्राह्मण पुजारी है। पूजा श्रीनाथ जी की पूजा पद्धति के अनुसार होती है।

शिला देवी (अन्नपूर्णा) (आमेर) :


जयपुर के कच्छवाह राजवंश की आराध्य देवी जिसे आमेर के महाराजा मानसिंह प्रथम पूर्वी बंगाल के राजा केदार से लाये थे।

छींक माता : राज्य में माघ सुदी सप्तमी को छींक माता की पूजा होती है। जयपुर के गोपालजी के रास्ते में इनका मंदिर है।

अम्बिका माता :


जगत (उदयपुर) में इनके मंदिर का निर्माण 10वीं सदी में राजा अल्लट ने महामारू शैली में करवाया। जगत का अम्बिका मंदिर 'मेवाड़ का खजुराहो' के रूप में प्रसिद्ध है।

खेड़ा देवी :


सिंह पर सवार दुर्गामाता को ही प्रायः खेड़ा देवी के रूप में पूजा जाता है। लोक आस्था के अनुसार यह देवी उस गांव, खेड़ा-ढाणी की रक्षा करती है जहां इसे प्रतिष्ठित किया जाता है।

इसीलिए इसे गांव की स्थापना के समय खेड़ाखूट के रूप में विरचित किया जाता है। खेड़ा देवी का मंदिर गांव के बीच में अथवा गांव के बाहर किसी पहाड़ी, टेकड़ी अथवा किसी घने वृक्ष के पास भी हो सकता है।

लाला-फूलां :


काला-गोरा भैंरू की तरह ही लाला-फूलां की मूरतें स्त्री आकृतियों के रूप में बनाई जाती हैं। ये सिकोतरी या शक्ति के रूप में मेवाड़ क्षेत्र में बहुमान्य रही हैं।

रूपण माता :


मेवाड़ में हल्दीघाटी के पास रूपण माता के देवरे में देवी की अनगढ़ मूर्ति है। रूपण माता के तोरण भी बनाये जाते हैं। जिनमें रूपण माता स्त्री के रूप में होती है।


जूनी जाल की माता : 'जाल' के वृक्ष के नीचे देवी का स्थान बना है। यह देवी मंदिर 'वाहदरिया' (भादरियाराय) नाम से प्रसिद्ध हुआ।


उष्ट्रवाहिनी देवी : पुष्करणा ब्राह्मणों की कुलदेवी है। उष्ट्रवाहिनी देवी। ओडिशा, राजस्थान तथा गुजरात में ऊँट पर आरूढ़ देवी की उपासना होती है। इनका एक अन्य नाम सारिकादेवी भी है। जोधपुर तथा बीकानेर में इनके कई मंदिर हैं।

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